Thursday, May 10, 2012

जलेबी दी दो

जलेबी दी दो


बडे़ लोगों की बात कुछ अलग होती है। उनके बेटों की बात और भी अलग होती है। छोटे यानी गरीबों के बारे में आपको क्या कहना है? और उनके बच्चों की! कल मैं जब दफ्तर से घर जा रहा था...बारिश का दिन था........ उस मोड़ पर एक दुकान में गया........मेरा नम्बर तीसरा था। मेरे आगे दो बच्चे थे। जो लाईन में सबसे आगे खड़ा था, यूंही कुछ सात आठ बरस का होगा। जींस पैंट और टेडी बेयर वाली शर्ट पहने हुए, प्यारा सा लड़का। उसकी बगल में खड़ी एक युवती ने मुझे देखा और प्यारे से बच्चे की गाल पर थपकी दी। साफ- सुथरे बच्चे के पीछे ..........उसी के जैसा ........उसी हाईट का। गंदी- सी स्वेटर और फटी पैंट वाला, पी कैप पहने हुए। उसकी नाक भी गंदी थी। लेकिन आंखें साफ थी। एकदम साफ। पहला लड़का दुकानदार से ’’अंकल! आधा कीलो जलेबी देना’’...........और उसने दस- दस के चार नोट लाला जी को थमाए। दूसरा लड़का, ’’ ........पांच रुपये की देना’’ । लाला ने हड़काते हुए कहा , अबे पांच रुपये की क्या मिलेगी???? तपाक से लड़का बोला, तो क्या ये पैसे नहीं हैं? ’’ ’’स्कूल तो मेरा भाई जाता है। मैं भी जाऊंगा.........अभी तो परचून की दुकान पर काम करता हूं। हम यहां से (दिल्ली से) नहीं हैं। बापू.........? अच्छा उसने रिक्शा लिया है........किराये पर। मेरा नाम- मनोज। गांव- बिहार में है। मैं उससे बतिया रहा था। तब तक बगल वाली युवती मेरे आगे खड़ी थी। उससे भी आगे चार -पांच लोग लाईन में खडे़ हो गए। सब पावभर, आधा कीलो और कीलो तक जलेबी ले गए। कल बारिश का दिन था, सो मैंने मैले-कुचैले कपड़ों वाले किसी लड़के से पहली बार बात की होगी.......वर्ना ऐसे तो कई बच्चे घूमते- फिरते हैं। आप उनके नाम कहां तक पूछते फिरेंगे!

डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं..चकार चण्ड्ताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम्


Tuesday, February 8, 2011

गोल......गोल..


बडे़ लोगों की बात कुछ अलग होती है। उनके बेटों की बात और भी अलग होती है। छोटे यानी गरीबों के बारे में आपको क्या कहना है? और उनके बच्चों की! कल मैं जब दफ्तर से घर जा रहा था...बारिश का दिन था........ उस मोड़ पर एक दुकान में गया........मेरा नम्बर तीसरा था। मेरे आगे दो बच्चे थे। जो लाईन में सबसे आगे खड़ा था, यूंही कुछ सात आठ बरस का होगा। जींस पैंट और टेडी बेयर वाली शर्ट पहने हुए, प्यारा सा लड़का। उसकी बगल में खड़ी एक युवती ने मुझे देखा और प्यारे से बच्चे की गाल पर थपकी दी। साफ- सुथरे बच्चे के पीछे ..........उसी के जैसा ........उसी हाईट का। गंदी- सी स्वेटर और फटी पैंट वाला, पी कैप पहने हुए। उसकी नाक भी गंदी थी। लेकिन आंखें साफ थी। एकदम साफ। पहला लड़का दुकानदार स,े ’’अंकल! आधा कीलो जलेबी देना’’............और उसने दस- दस के चार नोट लाला जी को थमाए। दूसरा लड़का, ’’ ........पांच रुपये की देना’’ । लाला ने हड़काते हुए कहा , अबे पांच रुपये की क्या मिलेगी???? तपाक से लड़का बोला, तो क्या ये पैसे नहीं हैं? ’’ ’’स्कूल तो मेरा भाई जाता है। मैं भी जाऊंगा.........अभी तो परचून की दुकान पर काम करता हूं। हम यहां से (दिल्ली से) नहीं हैं। बापू.........? अच्छा उसने रिक्शा लिया है........किराये पर। मेरा नाम- मनोज। गांव- बिहार में है। मैं उससे बतिया रहा था। तब तक बगल वाली युवती मेरे आगे खड़ी थी। उससे भी आगे चार -पांच लोग लाईन में खडे़ हो गए। सब पावभर, आधा कीलो और कीलो तक जलेबी ले गए। कल बारिश का दिन था, सो मैंने मैले-कुचैले कपड़ों वाले किसी लड़के से पहलह बार बात की होगी.......वर्ना ऐसे तो कई बच्चे घूमते- फिरते हैं। आप उनके नाम कहां तक पूछते फिरेंगे!

Saturday, February 27, 2010

सब को रंग दो

हर किसी को रंग चाहिए
मुझको भी तुझको भी उसको भी
जीवन में एक संग चाहिए
मुझको भी तुझको भी उसको भी


जीवन का एक रंग निराला
सबसे अच्छा  प्यार वाला
इसके आगे सब फीका है
ये तो सारा जग जीता है
इसकी जरूरत सबको है
मुझको भी तुझको भी उसको भी

यारो उसकी बात सुनो तो
प्यार से उससे बात करो तो
जो समझे आश की कमी
जीवन में विश्वास की कमी

उसे  चाहिए येसा रंग 
 जीवन में एक सच्चा संग
मेरे तो दो बोल बहुत
तू भी दिल से तोल बहुत

होली पर  मेहमानों को
प्यार ठीठेली अफसानों को
मेरा ये संदेशा दी दो
 उसको  उसको भी  उसको भी......
हर किसी को रंग चाहिए
हर किसी को रंग चाहिए

हर किसी को रंग चाहिए

मुझको भी तुझको भी उसको भी......




















Monday, February 8, 2010

प्यार के दिन.....

{यह और कौन कर सकता है
शायद हर कोई}

सुबह-सुबह
तेरा मंदिर में जाना
रोज की तरह
घंटे-घड़ियाल की ध्वनि सुनना
फ़ोन पर

जिंदगी और संवर जाती है
कि
तेरी याद आती है
बस ये बात है
 
हर दिन प्रेम का है 
पर 
बसंत के पखवाड़े की
अपनी रंगत होती है...... 
प्यार के दिन 
प्यार में दिन 
खूब मनाओ 
जिंदगी भर 

झगड़े-फसाद और नफरत 
दूर भगाओ
बहुत दूर 
बस ये बात है

प्यार
कभी बूढ़ा नहीं होता
हाँ
धूल खूब आकर्षित  होती है
मकड़ जाले-से लग जाते हैं 
उसपर बस 
ये बात है. 

इस  प्यार में
थोड़ा ताजगी लाओ
आओ, तुम जल्दी आओ  
मुझे निहारो फिर से
पहले जैसे

और मैं,.....
मैं तो कब से 
इस दिन के इंतजार में 
कि तुम 
कब आओगे 
कब बहुरेंगे दिन 
यह ही कहना था
बस ये बात है......

Tuesday, February 2, 2010

ये मेरी कविता- ये तेरी कविता


ऐसा होता है

जाने क्यों
पर
डबडबाती हैं आँख
जब भी
तेरी याद आने ते पहले
लगता कि तुम भी याद कर रहे हो
मुझ से भी जियादा
पता नहीं क्यों
आँख का डबडबाना
और तेरा याद आना
पता नहीं क्यों.....
कि टपकती बूँदें
छूती हैं गालों को
लगता
जैसे बुझ रही हैं आग
मगर होता नहीं
ऐसा फिर से
कहीं दिल कि गहराइयों में
होने लगता है छप -छप धक्-धक्
लगता कि आग लगी हो
जैसे आँखें धुन्धुन्ला-सी जाती हैं
पता नहीं क्यों
......और मैं अपने हालत देख
तेरे बारे मैं सोचता हूँ
पता नहीं......