हर किसी को रंग चाहिए
मुझको भी तुझको भी उसको भी
जीवन में एक संग चाहिए
मुझको भी तुझको भी उसको भी
जीवन का एक रंग निराला
सबसे अच्छा प्यार वाला
इसके आगे सब फीका है
ये तो सारा जग जीता है
इसकी जरूरत सबको है
मुझको भी तुझको भी उसको भी
यारो उसकी बात सुनो तो
प्यार से उससे बात करो तो
जो समझे आश की कमी
जीवन में विश्वास की कमी
उसे चाहिए येसा रंग
जीवन में एक सच्चा संग
मेरे तो दो बोल बहुत
तू भी दिल से तोल बहुत
होली पर मेहमानों को
प्यार ठीठेली अफसानों को
मेरा ये संदेशा दी दो
उसको उसको भी उसको भी......
हर किसी को रंग चाहिए
हर किसी को रंग चाहिए
हर किसी को रंग चाहिए
मुझको भी तुझको भी उसको भी......
Saturday, February 27, 2010
Monday, February 8, 2010
प्यार के दिन.....
{यह और कौन कर सकता है
शायद हर कोई}
सुबह-सुबह
तेरा मंदिर में जाना
रोज की तरह
घंटे-घड़ियाल की ध्वनि सुनना
फ़ोन पर
जिंदगी और संवर जाती है
कि
तेरी याद आती है
बस ये बात है
हर दिन प्रेम का है
पर
बसंत के पखवाड़े की
अपनी रंगत होती है......
प्यार के दिन
प्यार में दिन
खूब मनाओ
जिंदगी भर
झगड़े-फसाद और नफरत
दूर भगाओ
बहुत दूर
बस ये बात है
प्यार
कभी बूढ़ा नहीं होता
हाँ
धूल खूब आकर्षित होती है
मकड़ जाले-से लग जाते हैं
उसपर बस
ये बात है.
इस प्यार में
थोड़ा ताजगी लाओ
आओ, तुम जल्दी आओ
मुझे निहारो फिर से
पहले जैसे
और मैं,.....
मैं तो कब से
इस दिन के इंतजार में
कि तुम
कब आओगे
कब बहुरेंगे दिन
यह ही कहना था
बस ये बात है......
शायद हर कोई}
सुबह-सुबह
तेरा मंदिर में जाना
रोज की तरह
घंटे-घड़ियाल की ध्वनि सुनना
फ़ोन पर
जिंदगी और संवर जाती है
कि
तेरी याद आती है
बस ये बात है
हर दिन प्रेम का है
पर
बसंत के पखवाड़े की
अपनी रंगत होती है......
प्यार के दिन
प्यार में दिन
खूब मनाओ
जिंदगी भर
झगड़े-फसाद और नफरत
दूर भगाओ
बहुत दूर
बस ये बात है
प्यार
कभी बूढ़ा नहीं होता
हाँ
धूल खूब आकर्षित होती है
मकड़ जाले-से लग जाते हैं
उसपर बस
ये बात है.
इस प्यार में
थोड़ा ताजगी लाओ
आओ, तुम जल्दी आओ
मुझे निहारो फिर से
पहले जैसे
और मैं,.....
मैं तो कब से
इस दिन के इंतजार में
कि तुम
कब आओगे
कब बहुरेंगे दिन
यह ही कहना था
बस ये बात है......
Tuesday, February 2, 2010
ये मेरी कविता- ये तेरी कविता
ऐसा होता है
जाने क्यों
पर
डबडबाती हैं आँख
जब भी
तेरी याद आने ते पहले
लगता कि तुम भी याद कर रहे हो
मुझ से भी जियादा
पता नहीं क्यों
आँख का डबडबाना
और तेरा याद आना
पता नहीं क्यों.....
कि टपकती बूँदें
छूती हैं गालों को
लगता
जैसे बुझ रही हैं आग
मगर होता नहीं
ऐसा फिर से
कहीं दिल कि गहराइयों में
होने लगता है छप -छप धक्-धक्
लगता कि आग लगी हो
जैसे आँखें धुन्धुन्ला-सी जाती हैं
पता नहीं क्यों
......और मैं अपने हालत देख
तेरे बारे मैं सोचता हूँ
पता नहीं......
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