{यह और कौन कर सकता है
शायद हर कोई}
सुबह-सुबह
तेरा मंदिर में जाना
रोज की तरह
घंटे-घड़ियाल की ध्वनि सुनना
फ़ोन पर
जिंदगी और संवर जाती है
कि
तेरी याद आती है
बस ये बात है
हर दिन प्रेम का है
पर
बसंत के पखवाड़े की
अपनी रंगत होती है......
प्यार के दिन
प्यार में दिन
खूब मनाओ
जिंदगी भर
झगड़े-फसाद और नफरत
दूर भगाओ
बहुत दूर
बस ये बात है
प्यार
कभी बूढ़ा नहीं होता
हाँ
धूल खूब आकर्षित होती है
मकड़ जाले-से लग जाते हैं
उसपर बस
ये बात है.
इस प्यार में
थोड़ा ताजगी लाओ
आओ, तुम जल्दी आओ
मुझे निहारो फिर से
पहले जैसे
और मैं,.....
मैं तो कब से
इस दिन के इंतजार में
कि तुम
कब आओगे
कब बहुरेंगे दिन
यह ही कहना था
बस ये बात है......
Monday, February 8, 2010
Subscribe to:
Post Comments (Atom)

No comments:
Post a Comment