Tuesday, February 2, 2010

ये मेरी कविता- ये तेरी कविता


ऐसा होता है

जाने क्यों
पर
डबडबाती हैं आँख
जब भी
तेरी याद आने ते पहले
लगता कि तुम भी याद कर रहे हो
मुझ से भी जियादा
पता नहीं क्यों
आँख का डबडबाना
और तेरा याद आना
पता नहीं क्यों.....
कि टपकती बूँदें
छूती हैं गालों को
लगता
जैसे बुझ रही हैं आग
मगर होता नहीं
ऐसा फिर से
कहीं दिल कि गहराइयों में
होने लगता है छप -छप धक्-धक्
लगता कि आग लगी हो
जैसे आँखें धुन्धुन्ला-सी जाती हैं
पता नहीं क्यों
......और मैं अपने हालत देख
तेरे बारे मैं सोचता हूँ
पता नहीं......

1 comment:

  1. Sach Yo Lamhe na Bhulenge
    Log Ayengi Aur Duniya Chalegi
    Par Kahi ek Kasak Hogi Ek Kami Hogi
    Tumhari Aur Hamari
    Kami Hoti rahegi Apne pan ki
    Kyonki Ye teri Kavita Aur Meri Kavita

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